महाभारत 17.2.16
रूपेण मत्समो नास्ति कश्चिदित्यस्य दर्शनम्अधिकश्चाहमेवैक इत्यस्य मनसि स्थितम्
rūpeṇa matsamo nāsti kaścidityasya darśanamadhikaścāhamevaika ityasya manasi sthitam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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