महाभारत 17.2.2
तं चाप्यतिक्रमन्तस्ते ददृशुर्वालुकार्णवम्अवैक्षन्त महाशैलं मेरुं शिखरिणां वरम्
taṃ cāpyatikramantaste dadṛśurvālukārṇavamavaikṣanta mahāśailaṃ meruṃ śikhariṇāṃ varam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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