महाभारत 17.2.3
तेषां तु गच्छतां शीघ्रं सर्वेषां योगधर्मिणाम्याज्ञसेनी भ्रष्टयोगा निपपात महीतले
teṣāṃ tu gacchatāṃ śīghraṃ sarveṣāṃ yogadharmiṇāmyājñasenī bhraṣṭayogā nipapāta mahītale
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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