महाभारत 18.2.36
एवं बहुविधा वाचः कृपणा वेदनावताम्तस्मिन्देशे स शुश्राव समन्ताद्वदतां नृप
evaṃ bahuvidhā vācaḥ kṛpaṇā vedanāvatāmtasmindeśe sa śuśrāva samantādvadatāṃ nṛpa
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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