महाभारत 18.5.29
विसर्जयित्वा विप्रांस्तान्राजापि जनमेजयःततस्तक्षशिलायाः स पुनरायाद्गजाह्वयम्
visarjayitvā viprāṃstānrājāpi janamejayaḥtatastakṣaśilāyāḥ sa punarāyādgajāhvayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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