महाभारत 18.5.30
एतत्ते सर्वमाख्यातं वैशंपायनकीर्तितम्व्यासाज्ञया समाख्यातं सर्पसत्रे नृपस्य ह
etatte sarvamākhyātaṃ vaiśaṃpāyanakīrtitamvyāsājñayā samākhyātaṃ sarpasatre nṛpasya ha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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