महाभारत 18.5.32
सर्वज्ञेन विधिज्ञेन धर्मज्ञानवता सताअतीन्द्रियेण शुचिना तपसा भावितात्मना
sarvajñena vidhijñena dharmajñānavatā satāatīndriyeṇa śucinā tapasā bhāvitātmanā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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