महाभारत 18.5.37
अह्ना यदेनः कुरुते इन्द्रियैर्मनसापि वामहाभारतमाख्याय पश्चात्संध्यां प्रमुच्यते
ahnā yadenaḥ kurute indriyairmanasāpi vāmahābhāratamākhyāya paścātsaṃdhyāṃ pramucyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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