महाभारत 2.11.5भगवन्द्रष्टुमिच्छामि पितामहसभामहम्येन सा तपसा शक्या कर्मणा वापि गोपतेbhagavandraṣṭumicchāmi pitāmahasabhāmahamyena sā tapasā śakyā karmaṇā vāpi gopateइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें