महाभारत 2.12.21
अथैवमुक्ते नृपतावृत्विग्भिरृषिभिस्तथामन्त्रिणो भ्रातरश्चास्य तद्वचः प्रत्यपूजयन्
athaivamukte nṛpatāvṛtvigbhirṛṣibhistathāmantriṇo bhrātaraścāsya tadvacaḥ pratyapūjayan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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