महाभारत 2.13.15
स्नेहबद्धस्तु पितृवन्मनसा भक्तिमांस्त्वयिप्रतीच्यां दक्षिणं चान्तं पृथिव्याः पाति यो नृपः
snehabaddhastu pitṛvanmanasā bhaktimāṃstvayipratīcyāṃ dakṣiṇaṃ cāntaṃ pṛthivyāḥ pāti yo nṛpaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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