महाभारत 2.14.5
शममेव परं मन्ये न तु मोक्षाद्भवेच्छमःआरम्भे पारमेष्ठ्यं तु न प्राप्यमिति मे मतिः
śamameva paraṃ manye na tu mokṣādbhavecchamaḥārambhe pārameṣṭhyaṃ tu na prāpyamiti me matiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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