महाभारत 2.15.4
अस्मिन्नर्थान्तरे युक्तमनर्थः प्रतिपद्यतेयथाहं विमृशाम्येकस्तत्तावच्छ्रूयतां मम
asminnarthāntare yuktamanarthaḥ pratipadyateyathāhaṃ vimṛśāmyekastattāvacchrūyatāṃ mama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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