महाभारत 2.16.19तयोर्मध्यगतश्चापि रराज वसुधाधिपःगङ्गायमुनयोर्मध्ये मूर्तिमानिव सागरःtayormadhyagataścāpi rarāja vasudhādhipaḥgaṅgāyamunayormadhye mūrtimāniva sāgaraḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें