महाभारत 2.16.38
ते चतुष्पथनिक्षिप्ते जरा नामाथ राक्षसीजग्राह मनुजव्याघ्र मांसशोणितभोजना
te catuṣpathanikṣipte jarā nāmātha rākṣasījagrāha manujavyāghra māṃsaśoṇitabhojanā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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