महाभारत 2.17.8कस्यचित्त्वथ कालस्य पुनरेव महातपाःमगधानुपचक्राम भगवांश्चण्डकौशिकःkasyacittvatha kālasya punareva mahātapāḥmagadhānupacakrāma bhagavāṃścaṇḍakauśikaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें