महाभारत 2.20.4
अतोऽन्यथाचरँल्लोके धर्मज्ञः सन्महाव्रतःवृजिनां गतिमाप्नोति श्रेयसोऽप्युपहन्ति च
ato'nyathācaram̐lloke dharmajñaḥ sanmahāvrataḥvṛjināṃ gatimāpnoti śreyaso'pyupahanti ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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