महाभारत 2.21.22
एवमुक्तः स कृष्णेन पाण्डवः परवीरहाजरासंधस्य तद्रन्ध्रं ज्ञात्वा चक्रे मतिं वधे
evamuktaḥ sa kṛṣṇena pāṇḍavaḥ paravīrahājarāsaṃdhasya tadrandhraṃ jñātvā cakre matiṃ vadhe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें