महाभारत 2.21.4
धारयन्नगदान्मुख्यान्निर्वृतीर्वेदनानि चउपतस्थे जरासंधं युयुत्सुं वै पुरोहितः
dhārayannagadānmukhyānnirvṛtīrvedanāni caupatasthe jarāsaṃdhaṃ yuyutsuṃ vai purohitaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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