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महाभारत 2.22.34
किं कुर्मः पुरुषव्याघ्र ब्रवीहि पुरुषर्षभकृतमित्येव तज्ज्ञेयं नृपैर्यद्यपि दुष्करम्
kiṃ kurmaḥ puruṣavyāghra bravīhi puruṣarṣabhakṛtamityeva tajjñeyaṃ nṛpairyadyapi duṣkaram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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