महाभारत 2.22.6
भ्रामयित्वा शतगुणं भुजाभ्यां भरतर्षभबभञ्ज पृष्ठे संक्षिप्य निष्पिष्य विननाद च
bhrāmayitvā śataguṇaṃ bhujābhyāṃ bharatarṣabhababhañja pṛṣṭhe saṃkṣipya niṣpiṣya vinanāda ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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