महाभारत 2.24.2
अन्तर्गिरिं च कौन्तेयस्तथैव च बहिर्गिरिम्तथोपरिगिरिं चैव विजिग्ये पुरुषर्षभः
antargiriṃ ca kaunteyastathaiva ca bahirgirimtathoparigiriṃ caiva vijigye puruṣarṣabhaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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