महाभारत 2.25.4
तांस्तु सान्त्वेन निर्जित्य मानसं सर उत्तमम्ऋषिकुल्याश्च ताः सर्वा ददर्श कुरुनन्दनः
tāṃstu sāntvena nirjitya mānasaṃ sara uttamamṛṣikulyāśca tāḥ sarvā dadarśa kurunandanaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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