महाभारत 2.25.7उत्तरं हरिवर्षं तु समासाद्य स पाण्डवःइयेष जेतुं तं देशं पाकशासननन्दनःuttaraṃ harivarṣaṃ tu samāsādya sa pāṇḍavaḥiyeṣa jetuṃ taṃ deśaṃ pākaśāsananandanaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें