महाभारत 2.28.46
द्वीपं ताम्राह्वयं चैव पर्वतं रामकं तथातिमिंगिलं च नृपतिं वशे चक्रे महामतिः
dvīpaṃ tāmrāhvayaṃ caiva parvataṃ rāmakaṃ tathātimiṃgilaṃ ca nṛpatiṃ vaśe cakre mahāmatiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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