महाभारत 2.28.4
सुकुमारं वशे चक्रे सुमित्रं च नराधिपम्तथैवापरमत्स्यांश्च व्यजयत्स पटच्चरान्
sukumāraṃ vaśe cakre sumitraṃ ca narādhipamtathaivāparamatsyāṃśca vyajayatsa paṭaccarān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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