महाभारत 2.28.52
ततः संप्रेषयामास रत्नानि विविधानि चचन्दनागुरुमुख्यानि दिव्यान्याभरणानि च
tataḥ saṃpreṣayāmāsa ratnāni vividhāni cacandanāgurumukhyāni divyānyābharaṇāni ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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