महाभारत 2.28.54
एवं निर्जित्य तरसा सान्त्वेन विजयेन चकरदान्पार्थिवान्कृत्वा प्रत्यागच्छदरिंदमः
evaṃ nirjitya tarasā sāntvena vijayena cakaradānpārthivānkṛtvā pratyāgacchadariṃdamaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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