महाभारत 2.29.4
ततो बहुधनं रम्यं गवाश्वधनधान्यवत्कार्त्तिकेयस्य दयितं रोहीतकमुपाद्रवत्
tato bahudhanaṃ ramyaṃ gavāśvadhanadhānyavatkārttikeyasya dayitaṃ rohītakamupādravat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें