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महाभारत 2.3.17
तदाहृत्य तु तां चक्रे सोऽसुरोऽप्रतिमां सभाम्विश्रुतां त्रिषु लोकेषु दिव्यां मणिमयीं शुभाम्
tadāhṛtya tu tāṃ cakre so'suro'pratimāṃ sabhāmviśrutāṃ triṣu lokeṣu divyāṃ maṇimayīṃ śubhām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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