महाभारत 2.31.2
प्रययुः प्रीतमनसो यज्ञं ब्रह्मपुरःसराःसंश्रुत्य धर्मराजस्य यज्ञं यज्ञविदस्तदा
prayayuḥ prītamanaso yajñaṃ brahmapuraḥsarāḥsaṃśrutya dharmarājasya yajñaṃ yajñavidastadā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें