महाभारत 2.33.4इदमेवं न चाप्येवमेवमेतन्न चान्यथाइत्यूचुर्बहवस्तत्र वितण्डानाः परस्परम्idamevaṃ na cāpyevamevametanna cānyathāityūcurbahavastatra vitaṇḍānāḥ parasparamइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें