महाभारत 2.38.21
अन्यकामा हि धर्मज्ञ कन्यका प्राज्ञमानिनाअम्बा नामेति भद्रं ते कथं सापहृता त्वया
anyakāmā hi dharmajña kanyakā prājñamānināambā nāmeti bhadraṃ te kathaṃ sāpahṛtā tvayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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