महाभारत 2.4.4
वादित्रैर्विविधैर्गीतैर्गन्धैरुच्चावचैरपिपूजयित्वा कुरुश्रेष्ठो दैवतानि निवेश्य च
vāditrairvividhairgītairgandhairuccāvacairapipūjayitvā kuruśreṣṭho daivatāni niveśya ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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