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महाभारत 2.43.32
दैवमेव परं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम्दृष्ट्वा कुन्तीसुते शुभ्रां श्रियं तामाहृतां तथा
daivameva paraṃ manye pauruṣaṃ tu nirarthakamdṛṣṭvā kuntīsute śubhrāṃ śriyaṃ tāmāhṛtāṃ tathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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