महाभारत 2.45.14
संतोषो वै श्रियं हन्ति अभिमानश्च भारतअनुक्रोशभये चोभे यैर्वृतो नाश्नुते महत्
saṃtoṣo vai śriyaṃ hanti abhimānaśca bhārataanukrośabhaye cobhe yairvṛto nāśnute mahat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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