महाभारत 2.45.23
अपर्यन्तं धनौघं तं दृष्ट्वा शत्रोरहं नृपशर्म नैवाधिगच्छामि चिन्तयानोऽनिशं विभो
aparyantaṃ dhanaughaṃ taṃ dṛṣṭvā śatrorahaṃ nṛpaśarma naivādhigacchāmi cintayāno'niśaṃ vibho
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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