Loading
महाभारत 2.45.42
स हि धर्मं पुरस्कृत्य दीर्घदर्शी परं हितम्उभयोः पक्षयोर्युक्तं वक्ष्यत्यर्थविनिश्चयम्
sa hi dharmaṃ puraskṛtya dīrghadarśī paraṃ hitamubhayoḥ pakṣayoryuktaṃ vakṣyatyarthaviniścayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें