महाभारत 2.45.47
ततः संस्तीर्य रत्नैस्तामक्षानावाप्य सर्वशःसुकृतां सुप्रवेशां च निवेदयत मे शनैः
tataḥ saṃstīrya ratnaistāmakṣānāvāpya sarvaśaḥsukṛtāṃ supraveśāṃ ca nivedayata me śanaiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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