महाभारत 2.45.54
अशुभं वा शुभं वापि हितं वा यदि वाहितम्प्रवर्ततां सुहृद्द्यूतं दिष्टमेतन्न संशयः
aśubhaṃ vā śubhaṃ vāpi hitaṃ vā yadi vāhitampravartatāṃ suhṛddyūtaṃ diṣṭametanna saṃśayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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