महाभारत 2.52.18
दैवं प्रज्ञां तु मुष्णाति तेजश्चक्षुरिवापतत्धातुश्च वशमन्वेति पाशैरिव नरः सितः
daivaṃ prajñāṃ tu muṣṇāti tejaścakṣurivāpatatdhātuśca vaśamanveti pāśairiva naraḥ sitaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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