महाभारत 2.52.35
मनोज्ञमशनं भुक्त्वा विविशुः शरणान्यथउपगीयमाना नारीभिरस्वपन्कुरुनन्दनाः
manojñamaśanaṃ bhuktvā viviśuḥ śaraṇānyathaupagīyamānā nārībhirasvapankurunandanāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें