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महाभारत 2.53.11
शकुनिरुवाचश्रोत्रियोऽश्रोत्रियमुत निकृत्यैव युधिष्ठिरविद्वानविदुषोऽभ्येति नाहुस्तां निकृतिं जनाः
śakuniruvācaśrotriyo'śrotriyamuta nikṛtyaiva yudhiṣṭhiravidvānaviduṣo'bhyeti nāhustāṃ nikṛtiṃ janāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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