महाभारत 2.53.3
न हि मानं प्रशंसन्ति निकृतौ कितवस्य हशकुने मैव नो जैषीरमार्गेण नृशंसवत्
na hi mānaṃ praśaṃsanti nikṛtau kitavasya haśakune maiva no jaiṣīramārgeṇa nṛśaṃsavat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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