Loading
महाभारत 2.53.4
शकुनिरुवाचयोऽन्वेति संख्यां निकृतौ विधिज्ञ;श्चेष्टास्वखिन्नः कितवोऽक्षजासुमहामतिर्यश्च जानाति द्यूतं; स वै सर्वं सहते प्रक्रियासु
śakuniruvācayo'nveti saṃkhyāṃ nikṛtau vidhijña;śceṣṭāsvakhinnaḥ kitavo'kṣajāsumahāmatiryaśca jānāti dyūtaṃ; sa vai sarvaṃ sahate prakriyāsu
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें