महाभारत 2.55.17
समवेतान्हि कः पार्थान्प्रतियुध्येत भारतमरुद्भिः सहितो राजन्नपि साक्षान्मरुत्पतिः
samavetānhi kaḥ pārthānpratiyudhyeta bhāratamarudbhiḥ sahito rājannapi sākṣānmarutpatiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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