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महाभारत 2.57.3
उत्सङ्गेन व्याल इवाहृतोऽसि; मार्जारवत्पोषकं चोपहंसिभर्तृघ्नत्वान्न हि पापीय आहु;स्तस्मात्क्षत्तः किं न बिभेषि पापात्
utsaṅgena vyāla ivāhṛto'si; mārjāravatpoṣakaṃ copahaṃsibhartṛghnatvānna hi pāpīya āhu;stasmātkṣattaḥ kiṃ na bibheṣi pāpāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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