महाभारत 2.58.40
शिरो गृहीत्वा विदुरो गतसत्त्व इवाभवत्आस्ते ध्यायन्नधोवक्त्रो निःश्वसन्पन्नगो यथा
śiro gṛhītvā viduro gatasattva ivābhavatāste dhyāyannadhovaktro niḥśvasanpannago yathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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