महाभारत 2.61.14
भारद्वाजोऽपि सर्वेषामाचार्यः कृप एव चअत एतावपि प्रश्नं नाहतुर्द्विजसत्तमौ
bhāradvājo'pi sarveṣāmācāryaḥ kṛpa eva caata etāvapi praśnaṃ nāhaturdvijasattamau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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