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महाभारत 2.61.31
कथं ह्यविजितां कृष्णां मन्यसे धृतराष्ट्रजयदा सभायां सर्वस्वं न्यस्तवान्पाण्डवाग्रजः
kathaṃ hyavijitāṃ kṛṣṇāṃ manyase dhṛtarāṣṭrajayadā sabhāyāṃ sarvasvaṃ nyastavānpāṇḍavāgrajaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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